परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी के अवतरण दिवस पर विशेष – 30 अगस्त 2025…

हम मनुष्य बने,हमारा धर्म है मानवता का निर्वाह करना ” –
अघोर सहज,सरल और सुगम मार्ग है-
अवतरण –
20 वीं शताब्दी में एक सच्चे ,पवित्र साधु व युगप्रदर्शक औघड़ संत परम पूज्य श्री अघोरेश्वर भगवान राम जी का अवतरण भाद्र शुक्ल सप्तमी रविवार संवत् 1994 (12 सितंबर सन 1937)को हुआ।माँ गंगा की काफी मिन्नतों तप प्रार्थना के बाद एक महात्मा के बताए अनुष्ठान और उनके आशीर्वाद से गुंडी ग्राम जिला आरा (भोजपुर) बिहार के धर्म परायण दंपति श्री बैजनाथ सिंह एवं श्रीमती लखराजी देवी जी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ ।बालक के जन्म के समय बादलों की जबरदस्त गड़गड़ाहट ,गर्जना और चमकना ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रकृति आनंदित हो जय घोष कर रही हो, एक दिव्य बालक के प्राकट्य का स्वागत कर रही हो।आसपास पड़ौस के लोग भी प्रकृति के इस स्वरूप को देखकर बहुत अचंभित थे।
जन्म के समय आपकी अद्भुत लीला देखकर सब आश्चर्य चकित हुए जब दाई नार काटने गई तब दाई और दादी माँ दोनों ने जटाजुट युक्त नवजात बालक को पद्मासन मुद्रा में बैठा पाया।पूज्य माताश्री लखराजी देवी ने बालक के मुख में अलौकिक ज्योतिपुंज के दर्शन कर अचंभित हुई। नन्हे बालक की विलक्षण प्रतिभा व दिव्य लीला को देखकर वृद्ध माता पिता श्री बैजनाथ जी एवं मातश्री श्रीमती लखराजी देवी बहुत आल्हादित थे ,उन्हें यह आभाष होने लगा कि हमारे यहाँ बालक के रूप में साक्षात भगवान ही अवतरण लिए हैं ,इसलिए उन्होंने बालक का नाम “भगवान सिंह” रखा।
एक औघड़ लीक से हटकर –
आप अघोराचार्य दत्तात्रेय व बाबा कीनाराम के अवतार माने जाते हैं। आपने अघोर साधना की पवित्र परम्परा को शमशान से निकालकर समाज,राष्ट्र व विश्व कल्याण के लिए जन – जन से जोड़ने का अद्भुत युगपरिवर्तन का कार्य किया। इसीलिए आपको” एक औघड़ लीक से हटकर “के विशेषण से विभूषित किया जाता है।आपने समाज में कुष्ठ रोगियों को अछूत तथा समाज से बहिष्कृत समझे जाने की पीड़ा तथा समाज को ध्वंस कर रही सबसे बड़ी बुराई नशा के दुष्प्रभाव को बहुत गहराई से महसूस किया।तब आपने कुष्ठ रोगियों की सेवा और पूर्ण नशाबंदी का संकल्प लेकर अपने शिष्यों व अनुयाइयों को समाज सेवा और नशा बंदी का संकल्प एवं आव्हान किया।आप कुष्ठ रोगियों को अपने आश्रम में रखकर स्वयं अपने हाथों से उनकी साफ़ सफाई मलहम पट्टी व सेवा किया करते, यह मानव सेवा का अद्भुत कार्य आज भी निरंतर जारी है।यह मानव सेवा के अद्वतीय पुनीत कार्य को ग्रीनीज़ बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में बहुत गौरव व सम्मान के साथ दर्ज किया गया ।विस्तृत लोक को अलौकिक करने वाले शीलवान ऐसे साधु बिरले ही मिलते हैं।ऐसे सच्चे संत अलख होते हैं।इनके बारे में कुछ लिख पाना बहुत ही कठिन होता है।
अघोर दीक्षा-
बाल्यकाल से ही आपके तेज मस्तक,विलक्षण प्रतिभा और अद्भुत अलौकिक लीला का दिव्य प्रकाश आभा मंडल आस पड़ौस गांव शहर में प्रकाशित (बिखरने) होने लगा था ।आपने सर्वप्रथम वैष्णव संत श्री श्रीकांत जी से वैष्णव दीक्षा ग्रहण किया तब आपका नाम बालक भगवान दास पड़ा ।तत्पश्चात यत्रतत्र भ्रमण करते हुए वाराणसी पहुँचे ।प्रातः गंगा स्नान करने हेतु साधुओं के झुंड के साथ आगे बढ़ते गए ।रास्ते में डेढ़सी पुल के पास एक वृद्धा माता जी मिली ।वृद्ध माता के पूछने पर आपने काशी बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन की इच्छा प्रकट की।तब वृद्ध माता ने पहले गंगा स्नान करने का आदेश दिया। वृद्ध माता जी के निर्देश पर क्रिं कुंड स्थल गए जहाँ तत्कालीन महंत औघड़ संत बाबा राजेश्वर राम जी का दर्शन और सानिध्य प्राप्त किए।पूज्य बाबा राजेश्वर राम जी से अघोर की विधिवत दीक्षा ग्रहण किए तब आप “भगवान राम “ के नाम से विभूषित हुए ।घोर तपस्या साधना एवं अलौकिक अद्भुत शक्तियों से श्रीयुक्त दयानिधि करुणा के सागर ,औघड़ दानी अघोरेश्वर भगवान राम जी ने समाज में व्याप्त बुराइयों और अध्यात्म में छाई मलिनता को देखकर बहुत व्यथित हुए तब आपने संपूर्ण चेतना के साथ सदियों से चल रही अघोर की पवित्र परंपरा , उसके मूलतत्व और अध्यात्म की पवित्रता को विश्व कल्याणार्थ जन जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।अघोर साधना की पवित्र परम्परा को शमशान से निकालकर समाज व राष्ट्र से जोड़ने का अद्वितीय युगपरिवर्तन कार्य किया।माँ सर्वेश्वरी समूह की स्थापना कर समाज सेवा के लिए 19 सूत्रीय कार्यक्रम को प्रमुख लक्ष्य बनाया।
अघोर सहज,सरल और सुगम मार्ग है-
परम पूज्य अघोरेश्वर श्री भगवान राम जी ने बताया कि – “अघोर बहुत सहज ,सरल व सुगम मार्ग है।यह कोई पंथ या संप्रदाय नहीं है,यह एक पथ,जीवन जीने की पगडंडी,एक पद या अवस्था है।अघोर का मतलब ही है जो घोर न हो,कठिन या जटिल न हो,जहाँ घृणा न हो।केवल सद्भाव,पवित्र आत्मा,सदाचरण एवं सद्चरित्र हो।” हर तरह के साधु इस पद में हो सकते हैं और पाए जाते हैं।
” औघड़ तांत्रिक नहीं होते।वे तंत्र में विश्वास नहीं करते, अनर्गल देवी देवता में विश्वास नहीं करते।वे आपकी श्रद्धा और विश्वास में विश्वास करते हैं और वे अपने आप में विश्वास करते हैं, न किसी बाहरी पर । इसीलिए वर्णाश्रम व्यवस्था के जन्मदाता आज भी औघड़ों को क्रूर दृष्टि से देखते हैं तथा इनके बारे में भ्रांतियां फैलाते हैं। जब कोई अघोरेश्वर की स्थिति में पहुँच जाता हैं तो उसकी भाषा ‘ना’, ‘हाँ’ से भी परे हो जाती है। वे सभी पदार्थों से और सभी कारणों से अनासक्त रहने लगते हैं। इस स्थिति को ही ‘संज्ञाशून्य अवस्था’ कहते हैं।
शिव ही अघोर हैं।संसार के प्रथम अघोरी स्वयं शिव ही हैं। शिव ने ही अघोर की दीक्षा सर्वप्रथम माँ पार्वती को दी। इसीलिए शिव का एक नाम अघोरेश्वर भी है। यह एक बड़ा भ्रम है कि अघोरी शिव के उपासक होते हैं, अघोरी स्वयं शिव हो जाना चाहते हैं तो वे किस प्रकार शिव के उपासक हो सकते हैं। अघोरी माँ सर्वेश्वरी की उपासना शिव के बताये हुए अघोर मार्ग से करते हैं और माँ सर्वेश्वरी से उन्हें वही शिवत्व प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं जो उन्होंने शिव को प्रदान किया था।
समाज व राष्ट्र की पूजा गढ़े हुए देवताओं की पूजा से भी महान है –
परम पूज्य अघोरेश्वर ने अपने आशीर्वचनों में बार बार जोर देकर कहा कि-“हे ब्रह्मनिष्ठो!राष्ट्र और समाज की पूजा गढ़े हुए देवताओं की पूजा से भी महान है।अरे साधु! समाज की सेवा और उचित जनाकांक्षाओं की पूर्ति से बढ़कर कोई भी अन्य जाप तप, योग, ज्ञान और वैराग्य नहीं है।”
आपने अध्यात्म व धर्म के नाम पर समाज में व्याप्त प्रपंच,पाखंड, आडंबर, कुरीतियों,बुराइयों एवं भ्रांतियों का विरोध करते हुए उसके उन्मूलन व सहज, सरल, सुंदर , स्वस्थ, सुखी, समृद्ध समाज व राष्ट्र निर्माण के लिए पूरी पवित्रता के साथ “अघोर आध्यात्मिक चेतना” के सरल सुगम मार्ग प्रशस्त किया।
आपने सर्वेश्वरी समूह की स्थापना कर सर्वप्रथम समाज से बहिष्कृत कुष्ठ रोगियों की सेवा का संकल्प लिया ।उन्हें आश्रम में रखकर स्वयं अपने हाथों से उनकी सेवा तथा उपचार किया आज भी यह सेवा कार्य जारी है।ग्रीनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में यह अद्भुत सेवा पुनीत कार्य दर्ज किया गया है।आप सिद्धियों के प्रदर्शन व चमत्कार के सख्त खिलाफ थे।
अंध विश्वास,रूढ़िवाद,कुप्रथाओं को भक्ति का आधार न बनाएं-
परम पूज्य अघोरेश्वर श्री भगवान राम जी ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास,पाखंड,आडंबर,दिखावा,भेदभाव,कुरीतियों,धोखा धड़ी,ठगी, भ्रांतियां और बुराइयों के सख्त विरोधी थे।पूज्य बाबा जी हमेशा समझाया करते थे -“बंधुओं! धर्म के नाम पर अपने देश में बहुत से आडंबर हैं ,जिनकी आवश्यकता बिल्कुल नहीं है।फिर भी, दूसरों द्वारा कुछ अन्यथा सोच लेने के भय से ,तथा संकोच के चलते, उन्हें आप जबरदस्ती लादे फिर रहे हैं।ऐसे आडंबर से आपको क्षणिक राहत भले ही मिल जाये, परन्तु आप में स्थायी सुख शांति कभी नहीं आएगी।”
सभी धर्मों के शास्त्र का उद्देश्य ही सर पर उठा कर ले चलने वाली गठरी की तरह है न कि नौका की तरह जिस पर संसार सागर के पार उतरा जा सकता है। अपने आप में जो अनुभूति है उन शास्त्रों की और अपने अनुभवों के मध्य की, वह नौका की तरह है, जिससे अपने आप पार उतरा जा सकता है।
अघोरेश्वर महाप्रभु आशीर्वचनों के माध्यम से बहुत स्नेह पूर्वक समझाते थे कि-“देश में रूढिवादिता एवं कुप्रथाएं समाज पर छाई हुई हैं।ये कुप्रथाएं देश में अनेक धर्मों के जन्म लेने के लिए उत्तरदायी हैं।इन्हीं के कारण विदेशों के पाश्चात्य देशों के अनेक धर्म भारत में आकर प्रश्रय पाये।पूज्य श्री अघोरेश्वर ने साधुओं को,समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं दुर्व्यवस्थाओं के उन्मूलन को अपनी साधना का अंग बनाने के लिए प्रेरित किया।वे समझाते थे कि ‘हे साधु ! जैसे अपने मकान में रोज झाड़ू लगाने की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही समाज में भी जो लोग भयंकर कूड़ा करकट और दूषित वातावरण पैदा कर रहे हैं और उनके साथ ही जो अवांछनीय तत्व हैं उनके उन्मूलन में सहयोग करो। समाज की कुरीतियों पर जिनसे प्राणियों का जीवन त्रस्त होता है, कड़ी नज़र रखो और उनके उन्मूलन के लिए प्रयत्नशील रहो।”
काशी जाकर गंगा में स्नान करके, या जटा बढ़ाकर या माथा मुढ़ाकर मोक्ष प्राप्ति की इच्छा एक मृगतृष्णा ही है। तीर्थों में घूम घूमकर देवी देवताओं का पूजन करना यह साबित करता है कि आप परमात्मा के असली स्वरूप को बिल्कुल भूल गए हैं। तीर्थाटन आदि उन्हीं लोगों को शोभा देते हैं, जिन लोगों ने मनुष्य का खून चूसा है। आपके लिए यह सुगम मार्ग नहीं है।आपके लिए तो सुगम मार्ग यही है कि यदि किसी गरीब का बच्चा पढ़ नहीं पा रहा है तो पढ़ने में उसकी मदद करें।यदि किसी गरीब की कन्या की शादी नहीं हो पा रही है तो उसकी शादी में सहायता करें।ईश्वर भी यदि आपको मिल जाए तो वह यह नहीं कहेगा कि आप गंगा के किनारे बैठकर माला जपें, वह भी यही कहेगा कि आप किसी दुखी की सहायता करें,इसी से उसकी सृष्टि का पालन होगा।ऐसा करने से आप पुण्य और आंनद प्राप्त करेंगे जो योगियों को सतत योग साधना से भी संभवतः नहीं प्राप्त होता।”- (आघोरेश्वर की अनुकम्पा से उद्धृत)
हम मनुष्य बने,हमारा धर्म है मानवता का निर्वाह करना ” –
ईश्वर ने कोई जाति ,धर्म, समुदाय,भाषा आदि नहीं बनाया है। उसने तो हमें मनुष्य बनाकर, मनुष्यता के आचरण – निमित्त इस लोक में भेजा है।यथार्थ में हमारी मूल जाति है ” मानव जाति” एवम् हमारा धर्म है मानवता का निर्वाह करना “।
हम इस जाति – पाँत में बंटकर अपनी ‘ इंसानियत ‘ से अपनी ‘ मानवता ‘ से बहुत दूर चले जाते हैं। उन। भावनाओं को और विचारों को। हमें त्याग ही नहीं करना है; उसे पूरी तरह से जी जान लगाकर उखाड़ फेंकना है। हम मनुष्य हैं।। मनुष्य की कोई जाति नहीं है।मनुष्य की ‘ मुनष्य ही जाति है।”
अघोरेश्वर महाप्रभु अपने आशीर्वचनों में हमेशा कहते हम मुनष्य बनें एवं मन वचन से मनुष्यता का निर्वाह करें।हिन्दू, मुस्लिम,सिक्ख, इसाई, बौद्ध, जैन, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्व, आदि बनना आसान है किन्तु सही अर्थों में मुनष्य बनना बहुत कठिन है। इस युग तथा काल की पुकार है – कि हम अपनी मौलिक जाति मुनष्य जाति को भली भांति पहचानें एवम् सचेत हो कर अपने मौलिक धर्म ” मानवता का निर्वाह करें।”
पूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु जी ने शिक्षा और चिकित्सा के साथ साथ समाज की निम्न समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया:-
1नारी वर्ग को समाज में उचित सम्मान मिले। 2ढोंगी साधुओं को सही रास्ता दिखाया जाय।
3आध्यात्मिक अंधविश्वास को बढ़ावा न मिले। 4तिलक दहेज की परंपरा को बंद किया जाए।
5मरणोपरांत लेनदेन की क्रिया समाप्त हो। 6ऊंच – नीच, छुआछूत और भेदभाव समाप्त हो।
7उपेक्षितों, अपाहिजों एवं अनाथों को उचित सहायता मिले। 8राजनीतिक नेताओं में सद्बुद्धि हो।
9नवयुवकों का उचित मार्गदर्शन करें। 10छोटे बच्चों में आदर्श संस्कार भरें।
आप अलख निरंजन हैl केवल आपकी अनुकंपा और अहैतुक कृपा से ही कुछ पाया जा सकता है।आपकी महिमा, लीला ,करुणा कृपा अमित है।श्रद्धा,भक्ति और विश्वास के पात्र की क्षमता अनुसार ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है।
परम पूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु जी ,जो समय ,काल और कर्म था उसे पूर्ण कर 29 नवम्बर 1992 को ब्रह्मलीन हो गए।रमता है सो कौन घट घट में विराजत है।
आज 88वें अवतरणदिवस के पुण्य अवसर पर
परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु के श्री चरणों में सादर श्रद्धानत शत शत नमन करते हुए उनकी पवित्र वाणी सर्वजन कल्याणार्थ राष्ट्रहित में सादर समर्पित है।कोटि कोटि नमन।
गणेश कछवाहा
“काशीधाम”
रायगढ़ ,छत्तीसगढ़ ।
प्रवास – पुणे महाराष्ट्र।
94255 72284
gp.kachhwaha@gmail.com




